१. सही निर्णय का चुनाव करे
जीवन का हर क्षण निर्णय का क्षण होता है| प्रत्येक पथ पर दुसरे पथ के बिषय का निर्णय करना ही पडता है और निर्णय, अपना प्रभाव छोड़ जाता है| आज किये गए निर्णय भविष्य में सुख अथवा दुःख निर्मित करते है, ना केवल अपने लिये बल्कि अपने परिवार के लिये, आने वाली पीढियों के लिये भी.
जब कोई दुविधा सामने आती है, तो मन व्याकुल हो जाता है| अनिश्चय से भर जाता है| निर्णय का वह क्षण युद्ध बन जाता है और मन बन जाता है युद्ध भूमि |
अधिकतर निर्णय हम दुविधा के उपाय करने के लिए नहीं मन को शांत करने के लिये लेते हैं | पर क्या कोई दौड़ते हुए भोजन कर सकता है! नहीं ? तो क्या युद्ध से जूझता हुआ मन कोई योग्य निर्णय ले पायेगा?
वास्तव मैं जब कोई शांत मन से निर्णय करता है तो अपने लिए सुखद भविष्य बनाता है | किन्तु अपने मन को शांत करने के लिए कोई निर्णय करता है , तो वो व्यक्ति भविष्य में अपने लिये कांटो भरा वृक्ष लगाता है |
२.समस्याओं का सामना करे
सपनों एवं पूर्व अभ्यासो के आधार पर हम भविष्य के सुख - दुःख की कल्पना करते हैं.| भविष्य का दुःख दूर करने के लिये हम आज योजना बनाते है , कित्नु कल के संकट को आज निर्मूल करने से हमें लाभ मिलता है या हानि पहुँचती हैं ? ये प्रश्न हम कभी नहीं करते |
सच तो ये है कि संकट और उसका निवारण साथ जन्मते हैं , व्यक्ति के लिये भी और सृष्ठी के लिये भी | नहीं ?
आप अपने भूतकाल का स्मरण कीजिये , इतिहास को देखिये , आप तुरंत ही ये जान पायेंगे की जब जब संकट आता है तब तब उसका निवारण करने वाली शक्ति भी जनम लेती है , यही तो जगत का चलन हैं|
सपनों एवं पूर्व अभ्यासो के आधार पर हम भविष्य के सुख - दुःख की कल्पना करते हैं.| भविष्य का दुःख दूर करने के लिये हम आज योजना बनाते है , कित्नु कल के संकट को आज निर्मूल करने से हमें लाभ मिलता है या हानि पहुँचती हैं ? ये प्रश्न हम कभी नहीं करते |
सच तो ये है कि संकट और उसका निवारण साथ जन्मते हैं , व्यक्ति के लिये भी और सृष्ठी के लिये भी | नहीं ?
आप अपने भूतकाल का स्मरण कीजिये , इतिहास को देखिये , आप तुरंत ही ये जान पायेंगे की जब जब संकट आता है तब तब उसका निवारण करने वाली शक्ति भी जनम लेती है , यही तो जगत का चलन हैं|
वस्तुतःसंकट ही शक्ति के जन्म का कारण होता है |
प्रत्येक व्यक्ति जब संकट से निकलता है तो वो एक पद आगे बढ़ा होता है, अधिक चमकता है , आत्मविश्वास से भरा होता है , ना केवल अपने लिये अपितु विश्व के लिये | क्या यह सत्य नहीं ? वास्तव में संकट का जन्म है एक अवसर का जन्म, अपने आप को बदलने का, अपने विचारों को ऊँचा करने का, अपनी आत्मा को बलवान और ज्ञान्मंडित बनाने का | जो ये कर पाता है उसे कोई संकट नहीं होता किन्तु ये जो नहीं कर पाता वो तो स्वयं एक संकट है विश्व के लिए |
३. आत्मविश्वास
जीवन मैं आने वाले संघर्षों के लिए जब मनुष्य स्वयं को योग्य नहीं मानता, जब उसे अपने ही बल पर विश्वास नहीं रहता तब गुणों को त्याग कर दुर्गुणों को अपनाता है | वस्तुतः मनुष्य के जीवन में दुर्जनता जन्म ही तब लेती है जब उसके अंतर में आत्मविश्वास नहीं होता |
आत्मविश्वास ही अच्छाई को धारण करता है|
अब सवाल ये उठता है कि ये आत्मविश्वास है क्या ? जब मनुष्य ये मानता है कि जीवन का संघर्ष उसे दुर्बल बनाता है तो उसे अपने उपर विश्वास नहीं रहता वो संघर्ष के पार जाने के बदले संघर्ष से छूटने के उपाए ढूँढने लगता है किन्तु जब वो ये समझने लगता है कि ये संघर्ष उसे और अधिक शक्तिशाली बनाते हैं ठीक जैसे व्यायाम करने से देह की शक्ति बढती है, तो प्रत्येक संघर्ष के बाद उसका उत्साह बढ़ता है अर्थात् आत्मविश्वास और कुछ भी नहीं मन कि स्थिति , जीवन को देखने का दृष्टिकोण मात्र है और जीवन का दृष्टिकोण तो मनुष्य के अपने बस में होता है |
४. बच्चों की अच्छे से परवरिश करना
पिता सदा ही अपने संतान के सुख की कामना करते हैं, उनके भविष्य कि चिंता करते रहते हैं, इसी कारणवश सदा ही अपने संतानों के भविष्य का मार्ग स्वयं निश्चित करने का प्रयास करते रहते हैं | जिस मार्ग पर पिता स्वयं चला है | जिस मार्ग के कंकर पत्थर को स्वयं देखा है, मार्ग कि छाया, मार्ग कि धूप को स्वयं जाना है,उसी मार्ग पर उसका पुत्र चले यही उसकी इच्छा रहती है , निसंदेह उत्तम भावना है ये , किंतु तीन प्रश्नों के ऊपर विचार करना हम भूल ही जाते है , कोन से प्रश्न :
* क्या समय के साथ प्रत्येक मार्ग बदल नहीं जाते ? क्या समय सदा ही नई चुनोत्तिंयों को लेकर नहीं आता ? तो फिर बीते हुए समय के अनुभव नई पीढ़ी को किस प्रकार लाभ दे सकते है?
* क्या प्रत्येक संतान अपने माता पिता कि छबि होती है? हाँ , संतानों को संस्कार तो अवश्य माता पिता देते है है किन्तु भीतर कि क्षमता तो ईश्वर देते है| जिस मार्ग पर पिता को सफलता मिली है,विश्वास है कि उसी मार्ग पर उनको भी सफलता और सुख प्राप्त होगा|
*क्या जीवन के संघर्ष और चुनोतियाँ लाभकारी नहीं होती? क्या प्रत्येक नया प्रश्न नए उत्तर का द्वार नहीं खोलता ? फिर संतानों को नए नये प्रश्नों, संघर्षों से दूर रखना ये उनके लिये लाभ करना कहलायेगा या हानि करना अर्थात जिस प्रकार संतानों के भविष्य का निर्माण करने के बजाय उनके चरित्र का निर्माण करना श्रेष्ठ है वैसे ही संतानों के जीवन का मार्ग निश्चित करने के बजाय उन्हें नए संघर्षो के साथ जूझने के लिये मनोबल और ज्ञान देना अधिक लाभ दायक नहीं होगा|
५.योजनायों के आधार पर सफलता
कभी कभी कोई घटना मनुष्य के जीवन कि सभी योजनाओं को तोड़ देती है और मनुष्य उस आघात को जीवन का केंद्र मान लेता है, पर क्या भविष्य मनुष्य कि योजनायों के आधार पर निर्मित होते है? नहीं , जिस प्रकार किसी ऊँचे पर्वत पर सर्वप्रथम चढ़ने वाला उस पर्वत की तलाई में बैठकर जो योजना बनाता है तो क्या वही योजना उसे उस पर्वत कि चोटी तक पहुचाती है? नहीं, वास्तव में वो जैसे जैसे ऊपर चढ़ता है वैसे वैसे उसे नई नई चुनोतिया , नई नई बिडम्बना , नई नई अवरोध मिलते है , प्रत्येक पथ पर अपने अगले पथ का निर्णय करता है| प्रत्येक पथ पर उसे अपनी योजनायों को बदलना पडता है,कही पुरानी योजना उसे खाई में न गिरा दे| वो पर्वत को अपने योग्य नहीं बना पाता केवल स्वयं को पर्वत के योग्य बना सकता है? क्या जीवन के साथ भी ऐसा ही नहीं ? जब मनुष्य जीवन में एक चुनोती को, एक अवरोध को जीवन का केंद्र मान लेता है, अपने जीवन की गति को ही रोक देता है , वो अपने जीवन में सफल नहीं बन पाता नाही शांति और सुख प्राप्त कर पाता है , अर्थात जीवन को अपने योग्य बनाने के बदले स्वयं को जीवन के योग्य बनाना ही सफलता और सुख का एक मार्ग नहीं|
धन्यवाद
यु टियूब से लिया गया

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